♠ અણનમ માથાં ♠

ફ્રેન્ડશીપ-ડે ના અવસરે યુવા પેઢી પ્રેરિત થાય તેવી સુરેન્દ્રનગર જિલ્લાના આંબરડી ગામના બાર એકલોહિયા દોસ્તોની દિલેરીની સત્ય ઘટના પર આધારિત, રાષ્ટ્રીય શાયર ઝવેરચંદ મેઘાણી કૃત `સૌરાષ્ટ્રની રસધાર’ના ચોથા ભાગમાં આલેખાયેલી કથા : `અણનમ માથાં’

`આ સંસારની અંદર ભાઈબંધો તો કંઈક ભાળ્યા. પ્રાણને સાટે પ્રાણ કાઢી દેનારેય દીઠા. પણ જુગજુગ જેની નામના રહી ગઈ એવા બાર એકલોહિયા દોસ્તો તો સોરઠમાં આંબરડી ગામને ટીંબે આજથી સાડાચારસો વરસ ઉપર પાક્યા હતા. બે નહિ, ચાર નહિ, પણ બાર બાર ભાઈબંધોનું જૂથ. બારેય અંતર એકબીજાંને જાણે આંટી લઈ ગયેલાં. બાર મંકોડા મેળવીને બનાવેલી લોઢાની સાંકળ જોઈ લ્યો ! બાર ખોળિયાં સોંસરવો એક જ આત્મા રમી રહ્યો છે.’

– ઝવેરચંદ મેઘાણી

આ બારેયનો સરદાર વીસળ રાબો : પરજિયો ચારણ : સાત ગામનો ધણી : હળવદના રાજસાહેબનો જમણો હાથ, જેને દેવીની શકિતના પ્રતિક સમી પોતાની તલવાર સિવાય આ ધરતીના પડ ઉપર બીજા કોઈનીય સામે માથું ન ટેકવવાનું નીમ હતું.

ધાનરવ, સાજણ, નાગાજણ, રવિ, લખમણ, તેજરવ, ખીમરવ, આલગા, પાલા, વેરસલ — બધા પરજિયા ચારણ, જ્યારે બારમો કેશવગર બાવાજી.

એક વખત બારેય મિત્રોએ પણ ભેગા મળીને એકબીજાને કૉલ દીધાં :
`જીવવું-મરવું બારેયએ એકસંગાથે – ઘડી એકનુંય છેટું ન પડવા દેવું.’

વીર વીસળ અને તેના નરબંકા ભાઈબંધોની વાત ગુજરાતના સુલતાનને કાને પહોંચી.
તે સાંભળીને ધૂંઆપૂંઆ થઈ ગયેલા સુલતાને એમના સરદાર વીસળને બોલાવીને ધમકી આપી : `કાં સલામ દે, કાં લડાઈ લે’.

એમ ઝૂકવાને બદલે સુલતાનની વિશાળ ફોજનો મર્દાનગીભર્યો સામનો કરવાનું બારેય મિત્રોએ મુનાસિબ માન્યું.

યુધ્ધને એકતરફી થતું રોકવા તોપ- બંધૂકને બદલે તલવાર અને ભાલાનો જ ઉપયોગ કરવાનું સૂચન સુલતાનને એમણે કર્યું.

`કુંડે મરણ જે કરે, ગળે હેમાળાં, કરવત કે ભેરવ કરે, શીખરાં શખરાળાં;
ત્રિયા, ત્રંબાસ, આપતળ જે મરે હઠાળા, તે વર દિયાં, વીહળા, સગ થિયે ભવાળા.’

યુધ્ધ-ભૂમિમાં પ્રવેશતાં પહેલાં વીસળે તલવારથી કૂંડાળું કર્યું અને
સાંજ પડે મોતની આ સેજ પર સંગાથે સૂવા આવી પહોંચવા સહુ મિત્રોને આહવાન દીધું.

લડાઈ શરૂ થઈ.

જોગાનુજોગ એ ટાણે જ કંઈક કામસર ગામતરે ગયેલા તેજરવ સિવાયના
અગિયારેય ભડવીરો દુશ્મન-દળના ઘા સામી છાતીએ ઝીલવા સાથે
તલવારી પોતાની તાકાત દેખાડતા બહાદુરીભેર રણમેદાનમાં ઘૂમી રહ્યા.

નાલેશીભરી હાર સામે દેખાતાં સુલતાને વચનભંગ કરી દારૂગોળાનો પ્રયોગ આદર્યો.

યુધ્ધની અંતિમ ક્ષણોનું મેઘાણીએ કરેલું આબેહૂબ વર્ણન :

`પાતશાહી ફોજની ગલોલીઓ વછૂટી. ઢાલોને વીંધતાં સીસાં સોંસરવાં નીકળી ગયાં. છાતીઓ માથે ઘા પડ્યા. નવરાતરના ગરબા બની ગયેલા અગિયારેય ભાઈબંધો જુધ્ધમાંથી બહાર નીકળ્યા. કોઈ એક પગે ઠેકતો આવે છે. કોઈ વેરવિખેર આંતરડાં ઉપાડતો ચાલ્યો આવે છે. કોઈ ધડ હાથમાં માથું લઈને દોડ્યું આવે છે. એમ અગિયાર જણા પોતાની કાયાનો કટકે કટકો ઉપાડીને કૂંડાળે પહોંચ્યા. પછી વીસળે છેલ્લી વારનો મંત્ર ભણ્યો : “ભાઈબંધો, સુરાપરીનાં ધામ દેખાય છે : હાલી નીકળો !” સહુ બેઠા. લોહીનો ગારો કરીને સહુએ અક્કેક-બબ્બે પિંડ વાળ્યા. ઓતરાદાં ઓશીકાં કર્યાં. અને સામસામા રામરામ કરી અગિયારેય વીરલા પડખોપડખ પોઢ્યા.’

ભાઈબંધો યુધ્ધ ખેલવા રણમેદાન ભણી જતા હતા ત્યારે માથે પાણીનું માટલું માંડીને નેસમાંથી માંજુ રબારણ નીકળી. શીતળ જળ તેણે સહુને પાયાં.

સાંજ પડ્યે પાછા ફરશું ત્યારે તો તરસ વધારે લાગી હશે,
એ સાંભરતાં વીસળે માંજુને આ જ ઠેકાણે બરાબર એમની વાટ જોવા કહ્યું.

એ પ્રમાણે સાંજ સુધી ત્યાં બેસી રહેલી માંજુએ આંસુભીની આંખે, માથે વહાલથી હાથ ફેરવતાં,
ટોયલી ભરી ભરીને અગિયારેય મોતના વટેમાર્ગુઓને પાણી પાયું.

ગામતરે ગયેલો બારમો મિત્ર તેજરવ સાંજ ટાણે ગામ પાછો ફર્યો.

વાત જાણી તેવો જ માથે ફાળિયું ઓઢીને, સ્ત્રી સરખો વિલાપ કરતો ચિતામાં સળગી રહેલા ભાઈબંધો ભણી દોડ્યો.

આખરી પ્રયાણમાં રખેને પોતાના દિલોજાન દોસ્તોથી વિખૂટા પડી જવાય તે ડરે દોડતાં પહોંચી જઈ, હજી ભડભડી રહેલી ચિતા પર ચડીને ‘હર હર હર’ જાપ કરતાં કરતાં એણે પોતાના પ્રાણ ત્યાગી દીધા.

આંબરડી (સરા પાસે : ચોટીલાથી આશરે 35 કી.મી.ને અંતરે)
તાલુકો મૂળી, જિલ્લો સુરેન્દ્રનગર

સૌજન્ય: પંકજભાઈ મેઘાણી

-ઝવેરચંદ મેઘાણી
સૌરાષ્ટ્રની રસધાર


♠ जगदीश चन्द्र बोझ का आत्मविश्वास ♠



जगदीश चन्द्र बोझ महान भारतीय वैज्ञानिक थे। भारत में ही नहीं बल्कि दुनिया भर में उनकी ख्याति थी। एक बार वे वैज्ञानिकों के सम्मेलन में भाग लेने इंग्लैंड गए। विश्वभर के वैज्ञानिक वहां आए हुए थे। बोझ से सभी मिलना चाहते थे और उन्हें सुनना भी चाहते थे।

सम्मेलन का शुभारंभ होने के बाद सबसे पहले बसु को ही आमंत्रित किया गया। संयोगवश उन्होंने उन दिनों पौधों की संवेदनशीलता पर सफल प्रयोग किया था। उसी का प्रदर्शन उन्हें उस सम्मेलन में करना था।

उन्होंने एक पौधे को विषैला इंजेक्शन लगाया। ऐसा कर वे यह सिद्ध करना चाहते थे कि पौधे पर इसकी प्रतिक्रिया अवश्य होती है किन्तु इंजेक्शन लगाने पर पौधे पर कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई। यह देख बसु ने तत्काल कहा - जब पौधे पर इसका प्रभाव नहीं हुआ तो मुझ पर भी नहीं होगा। यह कहकर उन्होंने विष का दूसरा इंजेक्शन अपने हाथ में लगा लिया। यह देख सभी आश्चर्यचकित रह गए। इससे भी अधिक आश्चर्य उन्हें तब हुआ, जब बसु को भी कुछ नहीं हुआ। तत्पश्चात बसु ने पौधे को दूसरा इंजेक्शन लगाया तो वह तुरंत मुरझा गया।

वस्तुतः हुआ यह कि बोझ ने भूलवश पहले किसी अन्य दवा का इंजेक्शन लगा दिया था। इसलिए पौधे पर कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई किंतु उनमें आत्मविश्वास कूट-कूट कर भरा था, जिसके फलस्वरूप उस सम्मेलन में उन्होंने भरपूर प्रशंसा पाई।

अर्थात जब व्यक्ति में आत्मविश्वास हो तो जटिल परिस्थितियां भी आसान हो जाती हैं और सफलता के मार्ग खुल जाते हैं। इसलिए अपनी बुद्धि और क्षमता पर विश्वास रखते हुए किसी भी स्थिति का डटकर सामना करें।

♠ सफलता की चाबी ♠

एक व्यक्ति कहीं जा रहा था। अचानक उसने सड़क के किनारे बंधे हाथियों को देखा और वह रुक गया। उसने देखा कि हाथियों के अगले पैर में एक रस्सी बंधी हुई है। उसे इस बात पर आश्चर्य हुआ कि हाथी जैसे विशालकाय जीव लोहे की जंजीरों की जगह बस एक छोटी-सी रस्सी से बंधे हुए हैं। वे चाहते तो खुद को आजाद कर सकते थे, पर वे ऐसा नहीं कर रहे थे।

उसने पास खड़े महावत से पूछा, ‘‘भला ये हाथी किस प्रकार इतनी शांति से खड़े हैं और भागने का प्रयास भी नहीं कर रहे हैं।’’

महावत ने कहा, ‘‘इन हाथियों को छोटी उम्र से ही इन रस्सियों से बांधा जाता है। उस समय इनके पास इतनी शक्ति नहीं होती कि इस बंधन को तोड़ सकें। बार-बार प्रयास करने पर भी रस्सी न तोड़ पाने के कारण उन्हें धीरे-धीरे यकीन होता जाता है कि वे इन रस्सियों को नहीं तोड़ सकते और बड़े होने पर भी उनका यह यकीन बना रहता है। इसीलिए वे कभी इसे तोड़ने का प्रयास ही नहीं करते।’’


उस आदमी को यह बात बड़ी रोचक लगी। उसने इसके बारे में एक संत से चर्चा की।

संत ने मुस्कराकर कहा, ‘‘ये जानवर इसलिए अपना बंधन नहीं तोड़ सकते क्योंकि उनके मन में इस बात का विश्वास बैठ जाता है कि उनमें उन रस्सियों को तोड़ने की ताकत नहीं है। इसलिए वे इसके लिए कभी प्रयास भी नहीं करते।’’

दरअसल कई इंसान भी इन्हीं हाथियों की तरह अपनी किसी विफलता को एक कारण मान बैठते हैं कि अब उनसे यह काम हो ही नहीं सकता। वे अपनी बनाई हुई मानसिक जंजीरों में पूरा जीवन गुजार देते हैं। मगर मनुष्य को कभी प्रयास छोड़ना नहीं चाहिए।

♦ शिख ♦

→ प्रयास ही सफलता की चाबी है l

♠ सुदामा का त्याग ♠



एक ब्राह्मणी थी जो बहुत गरीब निर्धन थी l भिक्षा माँग कर जीवन यापन करती थी l एक समय ऐसा आया कि पाँच दिन तक उसे भिक्षा नहीं मिली वह प्रति दिन पानी पीकर भगवान का नाम लेकर सो जाती थी l छठवें दिन उसे भिक्षा में दो मुट्ठी चना मिले l कुटिया तक पहुँचते-पहुँचते रात हो गयी l ब्राह्मणी ने सोंचा अब ये चने रात मे नही खाऊँगी, प्रात:काल वासुदेव को भोग लगाकर तब खाऊँगी l यह सोंचकर ब्राह्मणी ने चनों को कपड़े में बाँधकर रख दिया और वासुदेव का नाम जपते-जपते सो गयी l

ब्राह्मणी के सोने के बाद कुछ चोर चोरी करने के लिए उसकी कुटिया मे आ गये l

इधर उधर बहुत ढूँढा चोरों को वह चनों की बँधी पोटली मिल गयी चोरों ने समझा इसमे सोने के सिक्के हैं इतने मे ब्राह्मणी जग गयी और शोर मचाने लगी l गाँव के सारे लोग चोरों को पकड़ने के लिए दौडे l चोर वह पोटली लेकर भागे l पकड़े जाने के डर से सारे चोर संदीपन मुनि के आश्रम में छिप गये l (संदीपन मुनि का आश्रम गाँव के निकट था जहाँ भगवान श्री कृष्ण और सुदामा शिक्षा ग्रहण कर रहे थे)

गुरुमाता को लगा की कोई आश्रम के अन्दर आया है गुरुमाता देखने के लिए आगे बढ़ी। चोर डर गये और आश्रम से भागे l भागते समय चोरों से वह पोटली वहीं छूट गयी. इधर भूख से व्याकुल ब्राह्मणी ने जब जाना ! कि उसकी चने की पुटकी चोर उठा ले गये तो ब्राह्मणी ने श्राप दे दिया कि '' मुझ दीनहीन असहाय के जो भी चने खायेगा वह दरिद्र हो जायेगा ”

उधर प्रात:काल गुरु माता आश्रम मे झाडू लगाने लगी झाडू लगाते समय गुरु माता को वही चने की पोटली मिली। गुरु माता ने पोटली खोल के देखी तो उसमे चने थे l सुदामा जी और श्रीकृष्ण जंगल से लकड़ी लाने जा रहे थे l

गुरु माता ने वह चने की पुटकी सुदामा जी को दे दी और कहा '' बेटा ! जब वन मे भूख लगे तो दोनों लोग यह चने खा लेना l सुदामा जी जन्मजात ब्रह्मज्ञानी थे l ज्यों ही चने की पुटकी सुदामा जी ने हाथ मे ली त्यों ही उन्हे सारा रहस्य मालूम हो गया l ''

सुदामा जी ने सोंचा ! गुरु माता ने कहा है यह चने दोनों लोग बराबर बाँट के खाना. लेकिन ये चने अगर मैने त्रिभुवनपति श्री कृष्ण को खिला दिये तो सारी सृष्टि दरिद्र हो जायेगी I मै ऐसा नही करुँगा मेरे जीवित रहते मेरे प्रभु दरिद्र हो जायें मै ऐसा कदापि नही करुँगा I मै ये चने स्वयं खा जाऊँगा लेकिन कृष्ण को नही खाने दूँगा और सुदामा जी ने सारे चने खुद खा लिए l दरिद्रता का श्राप सुदामा जी ने स्वयं ले लिया लेकिन अपने मित्र श्री कृष्ण को एक भी दाना चना नही दिया l

♠ अर्जुन का अंहकार ♠

एक दिन श्रीकृष्ण अर्जुन को अपने साथ घुमाने ले गए। रास्ते में उनकी भेंट एक निर्धन ब्राह्मण से हुई। उसका व्यवहार थोड़ा विचित्र था।

वह सूखी घास खा रहा था और उसकी कमर से तलवार लटक रही थी। अर्जुन ने उससे पूछा- 'आप तो अहिंसा के पुजारी हैं। जीव हिंसा के भय से सूखी घास खाकर अपना गुजारा करते हैं। लेकिन फिर हिंसा का यह उपकरण तलवार क्यों आपके साथ है?'

ब्राह्मण ने जवाब दिया- 'मैं कुछ लोगों को दंडित करना चाहता हूं। आपके शत्रु कौन हैं? अर्जुन ने जिज्ञासा जाहिर की।'

ब्राह्मण ने कहा 'मैं चार लोगों को खोज रहा हूं, ताकि उनसे अपना हिसाब चुकता कर सकूं। सबसे पहले तो मुझे नारद की तलाश है।

नारद मेरे प्रभु को आराम नहीं करने देते, सदा भजन-कीर्तन कर उन्हें जागृत रखते हैं। फिर मैं द्रौपदी पर भी बहुत क्रोधित हूं। उसने मेरे प्रभु को ठीक उसी समय पुकारा, जब वह भोजन करने बैठे थे।

उन्हें तत्काल खाना छोड़ पांडवों को दुर्वासा ऋषि के शाप से बचाने जाना पड़ा। शबरी जिन्होंने उसने मेरे भगवान को जूठा खाना खिलाया।

तब अर्जुन ने पूछा आपका तीसरा शत्रु कौन है? वह है हृदयहीन प्रह्लाद। उस निर्दयी ने मेरे प्रभु को गरम तेल के कड़ाह में प्रविष्ट कराया, हाथी के पैरों तले कुचलवाया और अंत में खंभे से प्रकट होने के लिए विवश किया।

चौथा शत्रु है अर्जुन। उसकी दुष्टता देखिए। उसने मेरे भगवान को अपना सारथी बना डाला। उसे भगवान की असुविधा का थोड़ा भी ध्यान नहीं रहा। कितना कष्ट हुआ होगा मेरे प्रभु को। यह कहते ही ब्राह्मण की आंखों में आंसू आ गए।

यह देख अर्जुन का घमंड चूर-चूर हो गया। उसने श्रीकृष्ण से क्षमा मांगते हुए कहा मान गया प्रभु, इस संसार में न जाने आपके कितने तरह के भक्त हैं। मैं तो कुछ भी नहीं हूं।

♠ प्रणाम की शक्ति ♠



महाभारत का युद्ध चल रहा था, एक दिन दुर्योधन के व्यंग्य से आहत होकर भीष्म पितामह घोषणा कर देते हैं कि वे अगले दिन पांडवों का वध कर देंगे। उनकी घोषणा का पता चलते ही पांडवों के शिविर में बेचैनी बढ़ गई। भीष्म की क्षमताओं के बारे में सभी को पता था इसलिए सभी किसी अनिष्ट की आशंका से परेशान हो गए। इस दौरान श्री कृष्ण ने द्रौपदी से कहा, तुम मेरे साथ अभी चलो। सभी को पता था कि इस परेशानी से बस श्रीकृष्ण ही उन्हें बाहर निकाल सकते हैं।

श्री कृष्ण द्रौपदी को लेकर सीधे भीष्म पितामह के शिविर में पहुंचे। शिविर के बाहर खड़े होकर उन्होंने द्रोपदी से कहा कि, अंदर जाकर पितामह को प्रणाम करो। द्रौपदी ने अंदर जाकर पितामह भीष्म को प्रणाम किया तो उन्होंने अखंड सौभाग्यवती भव का आशीर्वाद दिया। इसके बाद उन्होंने द्रौपदी से आने का कारण पूछा।

उन्होंने कहा कि वे इतनी रात में अकेली यहां कैसे आई है, क्या श्री कृष्ण उन्हें यहां लेकर आए हैं? द्रौपदी ने कहा कि, हां और वे कक्ष के बाहर ही खड़े हैं। यह सुनते ही भीष्म भी कक्ष के बाहर आ गए और दोनों ने एक दूसरे से प्रणाम किया।भीष्म ने कहा, उन्हें आभास था कि उनके एक वचन को उनके ही दूसरे वचन से काट देने का काम श्री कृष्ण ही कर सकते हैं। इसके बाद वे लौट गए।

शिविर से लौटते समय श्री कृष्ण ने द्रौपदी से कहा कि, तुम्हारे एक बार जाकर पितामह को प्रणाम करने से तुम्हारे पतियों को जीवनदान मिल गया है। इतना ही नहीं श्री कृष्ण ने द्रौपदी से कहा कि प्रणाम में बहुत शक्ति होती है, अगर वह प्रतिदिन भीष्म, धृतराष्ट्र, द्रोणाचार्य आदि को प्रणाम करती होतीं, वहीं दुर्योधन-दुःशासन आदि की पत्नियां भी पांडवों को प्रणाम करती होंतीं, तो शायद इस युद्ध की नौबत ही न आती।

♠ मांस का मूल्य ♠

मगध के सम्राट् श्रेणिक ने एक बार अपनी राज्य-सभा में पूछा कि- "देश की खाद्य समस्या को सुलझाने के लिए सबसे सस्ती वस्तु क्या है? "

मंत्री-परिषद् तथा अन्य सदस्य सोचमें पड़ गये। चावल, गेहूं, आदि पदार्थ तो बहुत श्रम बाद मिलते हैं और वह भी तब, जबकि प्रकृति का प्रकोप न हो। ऐसी हालत में अन्न तो सस्ता हो नहीं सकता। शिकार का शौक पालने वाले एक अधिकारी ने सोचा कि मांस ही ऐसी चीज है, जिसे बिना कुछ खर्च किये प्राप्त किया जा सकता है।

उसने मुस्कराते हुए कहा-"राजन्! सबसे सस्ता खाद्य पदार्थ तो मांस है। इसे पाने में पैसा नहीं लगता और पौष्टिक वस्तु खाने को मिल जाती है।"

सबने इसका समर्थन किया, लेकिन मगध का प्रधान मंत्री अभय कुमार चुप रहा।

श्रेणिक ने उससे कहा, "तुम चुप क्यों हो? बोलो, तुम्हारा इस बारे में क्या मत है?"

प्रधान मंत्री ने कहा, "यह कथन कि मांस सबसे सस्ता है, एकदम गलत है। मैं अपने विचार आपके समक्ष कल रखूंगा।"

रात होने पर प्रधानमंत्री सीधे उस सामन्त के महल पर पहुंचे, जिसने सबसे पहले अपना प्रस्ताव रखा था।

अभय ने द्वार खटखटाया।

सामन्त ने द्वार खोला। इतनी रात गये प्रधान मंत्री को देखकर वह घबरा गया। उनका स्वागत करते हुए उसने आने का कारण पूछा।

प्रधान मंत्री ने कहा -
"संध्या को महाराज श्रेणिक बीमार हो गए हैं। उनकी हालत खराब है। राजवैद्य ने उपाय बताया है कि किसी बड़े आदमी के हृदय का दो तोला मांस मिल जाय तो राजा के प्राण बच सकते हैं। आप महाराज के विश्ववास-पात्र सामन्त हैं। इसलिए मैं आपके पास आपके हृदय का दो तोला मांस लेने आया हूं। इसके लिए आप जो भी मूल्य लेना चाहें, ले सकते हैं। कहें तो लाख स्वर्ण मुद्राएं दे सकता हूं।"

यह सुनते ही सामान्त के चेहरे का रंग फीका पड़ गया। वह सोचने लगा कि जब जीवन ही नहीं रहेगा, तब लाख स्वर्ण मुद्राएं भी किस काम आएगी!

उसने प्रधान मंत्री के पैर पकड़ कर माफी चाही और अपनी तिजौरी से एक लाख स्वर्ण मुद्राएं देकर कहा कि इस धन से वह किसी और सामन्त के हृदय का मांस खरीद लें।

मुद्राएं लेकर प्रधानमंत्री बारी-बारी से सभी सामन्तों के द्वार पर पहुंचे और सबसे राजा के लिए हृदय का दो तोला मांस मांगा, लेकिन कोई भी राजी न हुआ। सबने अपने बचाव के लिए प्रधानमंत्री को एक लाख, दो लाख और किसी ने पांच लाख स्वर्ण मुद्राएं दे दी। इस प्रकार एक करोड़ से ऊपर स्वर्ण मुद्राओं का संग्रह कर प्रधान मंत्री सवेरा होने से पहले अपने महल पहुंच गए और समय पर राजसभा में प्रधान मंत्री ने राजा के समक्ष एक करोड़ स्वर्ण मुद्राएं रख दीं।

श्रेणिक ने पूछा, "ये मुद्राएं किसलिए हैं?"

प्रधानमंत्री ने सारा हाल कह सुनाया और बोले -
" दो तोला मांस खरीदने के लिए इतनी धनराशी इक्कट्ठी हो गई किन्तु फिर भी दो तोला मांस नहीं मिला। अपनी जान बचाने के लिए सामन्तों ने ये मुद्राएं दी हैं। अब आप सोच सकते हैं कि मांस कितना सस्ता है?"

जीवन का मूल्य अनन्त है। हम यह न भूलें कि जिस तरह हमें अपनी जान प्यारी होती है, उसी तरह सभी जीवों को अपनी जान प्यारी होती है ।

जियो और जीने दो हर किसी को  स्वेछा से जीने का अधिकार है l

प्राणी मात्र की रक्षा हमारा धर्म है l

जिओ और जिने दो l

♠ अपना - अपना मूल्य ♠

एक बार एक शिष्य ने विनम्रतापूर्वक अपने गुरु जी से पूछा, ‘‘गुरु जी, कुछ लोग कहते हैं कि जीवन एक संघर्ष है, कुछ कहते हैं कि जीवन एक खेल है और कुछ जीवन को एक उत्सव की संज्ञा देते हैं। इनमें कौन सही है?’’

गुरु जी ने तत्काल बड़े ही धैर्यपूर्वक उत्तर दिया, ‘‘पुत्र, जिन्हें गुरु नहीं मिला उनके लिए जीवन एक संघर्ष है, जिन्हें गुरु मिल गया उनका जीवन एक खेल है और जो लोग गुरु द्वारा बताए गए मार्ग पर चलने लगते हैं, मात्र वे ही जीवन को एक उत्सव का नाम देने का साहस जुटा पाते हैं।’’

यह उत्तर सुनने के बाद भी शिष्य पूरी तरह से संतुष्ट न था। गुरु जी को इसका आभास हो गया। वह कहने लगे,‘‘लो, तुम्हें इसी संदर्भ में एक कहानी सुनाता हूं। ध्यान से सुनोगे तो स्वयं ही अपने प्रश्न का उत्तर पा सकोगे।’’

उन्होंने जो कहानी सुनाई, वह इस प्रकार थी- किसी गुरुकुल में 3 शिष्यों ने अपना अध्ययन सम्पूर्ण करने पर अपने गुरु जी से यह बताने के लिए विनती की कि उन्हें गुरु दक्षिणा में उनसे क्या चाहिए। गुरु जी कहने लगे, ‘‘मुझे तुमसे गुरु दक्षिणा में एक थैला भर के सूखी पत्तियां चाहिएं, ला सकोगे?’’

वे तीनों मन ही मन बहुत प्रसन्न हुए क्योंकि उन्हें लगा कि वे बड़ी आसानी से अपने गुरु जी की इच्छा पूरी कर सकेंगे। वे उत्साहपूर्वक बोले, ‘‘जी गुरु जी, जैसी आपकी आज्ञा।’’

तीनों शिष्य चलते-चलते एक जंगल में पहुंचे लेकिन यह देखकर कि वहां पर तो सूखी पत्तियां केवल एक मुट्ठी भर ही थीं, उनके आश्चर्य का ठिकाना न रहा। वे सोच में पड़ गए कि आखिर जंगल से कौन सूखी पत्तियां उठाकर ले गया होगा? इतने में ही उन्हें दूर से आता हुआ एक किसान दिखाई दिया। वे उससे विनम्रतापूर्वक याचना करने लगे कि वह उन्हें केवल एक थैला भर सूखी पत्तियां दे दे लेकिन किसान ने उनसे क्षमा याचना करते हुए उन्हें बताया कि वह उनकी मदद नहीं कर सकता क्योंकि उसने सूखी पत्तियों का ईंधन के रूप में पहले ही उपयोग कर लिया था।

अब वे तीनों पास ही बसे एक गांव की ओर इस आशा से बढऩे लगे कि हो सकता है वहां उनकी कोई सहायता कर सके। वहां पहुंच कर उन्होंने जब एक व्यापारी को देखा तो बड़ी उम्मीद से उससे एक थैला भर सूखी पत्तियां देने के लिए प्रार्थना करने लगे लेकिन उन्हें फिर से निराशा ही हाथ आई क्योंकि व्यापारी ने तो पहले ही कुछ पैसे कमाने के लिए सूखी पत्तियों के दोने बनाकर बेच दिए थे। अब निराश होकर वे तीनों खाली हाथ ही गुरुकुल लौट गए।

गुरु जी प्रेमपूर्वक बोले, ‘‘निराश क्यों होते हो ? प्रसन्न हो जाओ और यही ज्ञान देने के लिए कि सूखी पत्तियां भी व्यर्थ नहीं हुआ करतीं बल्कि उनके भी अनेक उपयोग हुआ करते हैं, मैंने गुरु दक्षिणा के रूप में देने को कहा था।’’

तीनों शिष्य गुरु जी को प्रणाम करके खुशी-खुशी अपने-अपने घर की ओर चले गए। वह शिष्य जो गुरु जी की कहानी एकाग्रचित होकर सुन रहा था, अचानक बड़े उत्साह से बोला, ‘‘गुरु जी, अब मुझे अच्छी तरह से ज्ञात हो गया है कि आप क्या कहना चाहते हैं। आपका संकेत इसी ओर है न कि जब सर्वत्र सुलभ सूखी पत्तियां भी बेकार नहीं होती हैं तो फिर हम कैसे किसी वस्तु या व्यक्ति को छोटा मान कर उसका तिरस्कार कर सकते हैं?’’

अब शिष्य पूरी तरह से संतुष्ट था।

♠ बादशाह का अहंकार ♠

एक सम्राट के दरबार में एक अजनबी यात्री घूमता हुआ पहुंचा। उसने सुंदर-सी एक पगड़ी अपने सिर पर बांध रखी थी और एक खूबसूरत पगड़ी हाथ में लिए हुए था। देखने में वह युवक काफी खूबसूरत और आकर्षक व्यक्तित्व का था। उसकी पगड़ी देखते ही राजा ने कहा, ‘‘ऐसी पगड़ी तो बहुत मुश्किल से दिखाई पड़ती है। यह सुंदर पगड़ी आपको कहां से मिली?’’

अजनबी ने कहा, ‘‘मैं तो यह पगड़ी बेचने के लिए ही इस राज दरबार में आया हूं। मैं कई राज दरबारों से वापस आ चुका हूं, यह पगड़ी कोई बादशाह खरीद ही नहीं पाया। मुझे बताया गया कि आप ही यह पगड़ी खरीद सकते हैं।’’

बादशाह ने पूछा, ‘‘आपकी इस पगड़ी की क्या कीमत है?’’

उस युवक ने कहा, ‘‘एक हजार स्वर्ण मुद्राएं।’’
वजीर ने राजा के कान में फुसफुसाते हुए कहा कि, ‘‘महाराज यह तो ठगने का काम कर रहा है। यह साधारण-सी पगड़ी बीस-पच्चीस रुपए से ज्यादा की नहीं है। यह तो लूट रहा है।’’

यह बात वजीर ने कान में ही कही थी लेकिन वह युवक होशियार था। उसने अंदाजा लगा लिया कि वजीर ने राजा से क्या कहा होगा। वहीं खड़े-खड़े उसने बादशाह से कहा, ‘‘हुजूर इसका मतलब मैं यह समझूं कि यह पगड़ी आप नहीं खरीद पाएंगे।’’

बादशाह ने वजीर को बुलाया और कहा, ‘‘वजीर! इस युवक को दो हजार स्वर्ण मुद्राएं दी जाएं और यह पगड़ी खरीद लें।’’

बादशाह के स्वाभिमान की बात थी। एक हजार स्वर्ण मुद्राएं युवक द्वारा मांगी जा रही थीं लेकिन युवक की बातें सुनकर बादशाह का अहं भड़क उठा और उन्होंने कहा, ‘‘जब मेरे नाम पर पगड़ी बेचने आया है तो इसे दो हजार मुद्राएं देकर पगड़ी खरीदी जाए।’’

फिर क्या था, पगड़ी खरीद ली गई। वह अनजान यात्री वजीर से धीरे से बोला, ‘‘महोदय, आपको पगड़ी की कीमत मालूम होगी लेकिन मुझे बादशाहों की कमजोरियां भी मालूम हैं।’’

बादशाहों की कमजोरी उस युवक को मालूम थी। बस, इसीलिए वजीर की सारी सलाह बेकार गई और पच्चीस रुपए की पगड़ी दो हजार स्वर्ण मुद्राओं में खरीद ली गई।

🌹 शिख 🌹

- अहंकार ही मनुष्य की सबसे बडी कमजोरी है l